Next Story
Newszop

भारत-चीन संबंध : धोखे के इतिहास में सावधानी जरूरी

Send Push

-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत और चीन, एशिया की दो सबसे बड़ी शक्तियां, एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का सात साल बाद चीन दौरा और राष्ट्रपति शी जिनपिंग से उनकी मुलाकात केवल शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन का हिस्सा भर नहीं है, बल्कि इसे बदलते वैश्विक समीकरणों और अमेरिका के साथ रिश्तों में आई खटास की पृष्ठभूमि में नई कूटनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है। यह दिलचस्प है कि 2020 की गलवान घाटी झड़प के बाद राजनीतिक तनाव और चीनी सामानों के बहिष्कार की आवाजों के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ा है और इसका असंतुलन भारत को नुकसान पहुंचा रहा है।

औपचारिकता नहीं, रणनीति की बिसात

मोदी-जिनपिंग की यह मुलाकात सिर्फ एक औपचारिक संवाद नहीं, बल्कि भविष्य की रणनीतिक दिशा तय करने वाली कड़ी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका के टैरिफ वॉर और वैश्विक अर्थव्यवस्था में पैदा हुए भूचाल ने भारत और चीन को नजदीक आने पर मजबूर किया है लेकिन भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इस करीबी में अपने हित साधे, न कि चीन को एकतरफा फायदा करने का अवसर दे। इतिहास बार-बार चेतावनी देता है कि चीन पर आंख मूंदकर भरोसा करना खतरनाक है।

विश्वास की नींव और पहला धोखा

स्‍वाधीनता के शुरुआती वर्षों में भारत और चीन के रिश्ते सहयोग की नींव पर खड़े हुए। पंडित नेहरू और माओ त्से तुंग के बीच संवाद ने हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे को जन्म दिया। लेकिन इस नारे की आड़ में चीन अपने सामरिक हित साध रहा था। 1950 में उसने तिब्बत पर कब्जा कर लिया और 1954 में पंचशील समझौते के बावजूद अक्साई चिन से होकर शिनजियांग-तिब्बत हाईवे (जी-219) का निर्माण कर डाला। भारत को इसका पता भी देर से चला। यह चीन की उस सोच का पहला प्रमाण था कि दोस्ती के साथ-साथ वह गुप्त रूप से भारत के खिलाफ भी तैयारी कर रहा है।

दलाई लामा और रिश्तों की दरार

1959 में जब दलाई लामा को भारत ने शरण दी, तो चीन को यह बेहद नागवार गुजरा। चीन ने भारत को दुश्मन की निगाह से देखना शुरू कर दिया। सीमा विवाद गहराने लगे। भारत अब भी विश्वास की भाषा बोल रहा था, लेकिन चीन धीरे-धीरे युद्ध की ओर बढ़ रहा था। यही अविश्वास 1962 के युद्ध में बदल गया।

1962 का युद्ध : भरोसे पर करारी चोट

अक्टूबर 1962 में चीन ने अचानक भारत पर हमला कर दिया। भारत इस युद्ध के लिए तैयार नहीं था। परिणाम यह हुआ कि भारत को करारी हार झेलनी पड़ी और करीब 38,000 वर्ग किमी क्षेत्र (अक्साई चिन) पर चीन ने कब्जा कर लिया। हिन्‍दी-चीनी भाई-भाई का सपना टूट गया और यह साफ हो गया कि चीन पर भरोसा करना आत्मघाती है। यह भारत-चीन संबंधों का वह मोड़ था जिसने आगे की दशकों की दिशा तय कर दी।

सीमाई संघर्षों की लंबी सूची

1962 के बाद भी चीन की आक्रामकता खत्म नहीं हुई। 1967 में सिक्किम के नाथू ला और चो ला में मुठभेड़ हुई, जिसमें भारत ने चीन को करारा जवाब दिया और उसे पीछे हटना पड़ा। 1987 में अरुणाचल प्रदेश के समडोरोंग चू विवाद ने हालात को युद्ध की कगार पर ला दिया, लेकिन भारत की दृढ़ता ने तनाव कम किया। 2013 में देपसांग, 2014 में चुमार और 2017 में डोकलाम में चीन ने फिर घुसपैठ की कोशिश की। डोकलाम में 73 दिन तक गतिरोध चला और भारत ने चीन की सड़क बनाने की कोशिश रोक दी। 2020 में गलवान घाटी में खूनी संघर्ष हुआ जिसमें भारत के 20 जवान बलिदान हुए और चीन को भी भारतीय जवानों के प्रतिउत्‍तर से भारत की तुलना में कई गुना नुकसान उठाना पड़ा। यह दशकों बाद सबसे बड़ा सैन्य टकराव था।

व्यापार का बढ़ता असंतुलन

राजनीतिक तनाव और सीमा विवादों के बावजूद भारत-चीन व्यापार लगातार बढ़ रहा है लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान भारत को हो रहा है। चीन सस्ते औद्योगिक उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनें भारत को बेचता है, जबकि भारत से उसका आयात बहुत कम है। नतीजा यह है कि भारत को भारी व्यापार घाटा झेलना पड़ रहा है। वित्त वर्ष 2024-25 में 99.2 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 8,70,000 करोड़ रुपये) का रहा। यह घाटा भारतीय मैन्युफैक्चरिंग और मेक इन इंडिया अभियान के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

अमेरिका, रूस और वैश्विक समीकरण

आज वैश्विक राजनीति में अमेरिका का टैरिफ वॉर, रूस-यूक्रेन संघर्ष और बदलते गठबंधन सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। रूस लंबे समय से भारत-चीन-रूस (रिक) त्रिकोणीय सहयोग की बात करता रहा है। अमेरिका नहीं चाहता कि भारत और चीन मिलकर एशिया में एक नया आर्थिक और सामरिक ध्रुव बनाएं। लेकिन दूसरी ओर चीन-पाकिस्तान की दोस्ती भारत के लिए लगातार खतरा बनी हुई है। पाकिस्तान का 80 फीसदी सैन्य साजोसामान चीन से आता है और चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) पाकिस्तान के रास्ते होकर गुजरता है। ऐसे में भारत के लिए यह दोहरी चुनौती है। एक तरफ चीन से सहयोग और दूसरी तरफ चीन-पाकिस्तान गठजोड़ से खतरा।

विशेषज्ञों की चेतावनी

सेना के पूर्व अधिकारी लगातार चेताते हैं कि चीन पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता। गलवान के बाद भी हालात सामान्य नहीं हुए हैं। चीन लगातार अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताता है और भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर सवाल खड़े करता है। वहीं औद्योगिक संगठनों का कहना है कि सस्ते चीनी सामान का आयात भारतीय मैन्युफैक्चरिंग के लिए खतरा है। लघु उद्योगों के नेता मानते हैं कि अगर भारत अपनी उत्पादन क्षमता और निर्यात नहीं बढ़ाएगा तो चीन पर निर्भरता उसे कमजोर बनाएगी।

आर्थिक अंतर और भारत की चुनौतियां

1980 के दशक में भारत और चीन की अर्थव्यवस्था लगभग बराबर थी। लेकिन चीन ने औद्योगिक क्रांति और विदेशी निवेश की मदद से अपनी अर्थव्यवस्था को कई गुना बढ़ा लिया। आज वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जबकि भारत उससे काफी पीछे है। दोनों की अर्थव्यवस्था में लगभग चार गुना का अंतर है। ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि वह अपनी मैन्युफैक्चरिंग, कृषि, आईटी और स्टार्टअप क्षेत्रों को मजबूत करे और आत्मनिर्भर भारत अभियान को गति दे। तभी वह चीन के साथ बराबरी से खड़ा हो सकेगा।

भविष्य की राह : अवसर और सावधानी

भारत और चीन दोनों ही आज वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के बड़े खिलाड़ी हैं। उनकी आबादी और बाजार मिलकर दुनिया को बदल सकते हैं। लेकिन सीमाई विवाद, अविश्वास और चीन-पाकिस्तान गठजोड़ भारत के लिए हमेशा खतरा रहेंगे। भारत को चीन के साथ व्यापार और सहयोग बढ़ाना चाहिए, लेकिन हर कदम पर सावधानी के साथ। हर समझौते और हर आर्थिक कदम का गहन मूल्यांकन जरूरी है।

भरोसे के बजाय सतर्कता

अत: भारत-चीन रिश्तों का इतिहास यही सिखाता है कि चीन दोस्ती की आड़ में अपने हित साधता है। 1950 के दशक का भाई-भाई नारा 1962 में धोखे में बदल गया। उसके बाद भी चीन बार-बार सीमा विवाद और आर्थिक दबाव से भारत को असहज करता रहा। आज जब प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग फिर मिल रहे हैं, तो यह केवल औपचारिक मुलाकात नहीं बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाला क्षण है। भारत को चीन के साथ सहयोग करना चाहिए, लेकिन भरोसे के बजाय सतर्कता की नीति अपनाते हुए। आर्थिक आत्मनिर्भरता, मजबूत रक्षा क्षमता और संतुलित कूटनीति ही वह रास्ता है जो भारत को चीन के संभावित धोखे से बचा सकती है। अवसरों का लाभ उठाते हुए भी भारत को इतिहास के सबक कभी नहीं भूलने चाहिए।

—————

(Udaipur Kiran) / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

Loving Newspoint? Download the app now